03 April 2026 04:42 PM

-रोशन बाफना : यह दुर्भाग्य है कि हमारा साहित्य पुरस्कार की चाह में दशकों से बेचारा साबित होता रहा है। एक लेखक जब किताब लिखता है तो यह अपने आप में ही पुरस्कार है। फिर पुरस्कार मांगने या पुरस्कार के लिए दावा करने की जरूरत क्या हुई। लेखक को स्वाभिमानी होना ही चाहिए। मांग के लिया तो क्या लिया, देने वाली संस्था स्वयं ही चुने तो पुरस्कार का महत्व। मगर पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्थाओं ने लेखकों को भिखारी बना दिया। कहते हैं आवेदन करो, तब कोई किताब चुनाव की प्रक्रिया में शामिल होगी।
हालांकि पुरस्कार की भीख मांगने के बावजूद पुरस्कार उसी को मिलता है जिसकी सैटिंग होती है। सैटिंग बोले तो चापलूसी, तेल मालिश, आवभगत, राजनीतिक दबाव वगैरह वगैरह। अरे भाई! क्यों मांगते हो पुरस्कार?
असली पुरस्कार तो वह है जब आपकी किताब को पाठक मिल जाए। जब आपकी किताब बुक स्टॉल्स पर उपलब्ध हो। जब पाठक किताब खरीदते समय अपनी विश लिस्ट में आपको स्थान दे दे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आपको मिले पुरस्कार सिर्फ सजावट का सामान है।
जब तक आपकी किताब लोगों की सोच को प्रभावित ना करे, काहे की किताब। पुरस्कार के लिए ही लिखते हो क्या? तो छोड़ दो लिखना।
पुरस्कार को दुकानदारी बना दिया गया है। हां, डेह में मिलने वाले राजस्थानी भाषा पुरस्कार अलग है। ये लोग आवेदन नहीं मांगते। बस चार किताबें मांगते हैं ताकि निर्णायक मंडल को उपलब्ध करवाई जा सके। यह काफी प्रतिष्ठित है। इसके अतिरिक्त 1-2 पुरस्कार और हो सकते हैं जो पारदर्शी हों, शेष पुरस्कार पूर्ण पारदर्शी तरीके से नहीं दिए जाते। ख़ासतौर पर राजस्थान में दिए जाने वाले पुरस्कार इसी श्रेणी में आते हैं। पिछली सरकार के वक्त राजस्थानी भाषा, संस्कृति एवं साहित्य अकादमी ने तो किताबों के चयन में हद ही कर दी थी। ऐसा लगा जैसे पुरस्कार प्रदान नहीं किए गए बल्कि बांटे गए हो। हद तो यह है कि इस अकादमी को राजस्थानी भाषा में लिखने वाले लेखकों की ही जानकारी नहीं। पुरस्कार देने वाली संस्थाओं का पहला दायित्व तो उस भाषा के समस्त लेखकों की सूची तैयार करना है। प्रकाशकों से यह सूची मांगी जा सकती है।
पुरस्कारों की इस दुर्दशा के पीछे लेखक भी एक कारण है। आख़िर निर्णायक मंडल में तो लेखक ही होते हैं। जब लेखक ही पारदर्शी नहीं तो साहित्य का भला कैसे हो सकता है। जब तक पुरस्कार चयन की प्रक्रिया में आवेदन मांगने की परंपरा खत्म नहीं होगी, चयन में पारदर्शिता नहीं आएगी तब तक अच्छी किताबें आना शुरू नहीं होगी। या यूं कहें कि कचराछाप किताबें छपना बंद नहीं होगी। पुरस्कार के लिए ही लिखा जाएगा तो लेखक को पाठक कहां से मिलेगा?!
अभी तो हाल यह भी है कि तू मुझे पुरस्कृत कर, मैं तुझे पुरस्कृत कर दूंगा। और तो और बंद कमरे में 5 जनों के बीच में भी पुरस्कार दे दिए जाते हैं। पहुंच होने की वजह से अख़बार में बड़ी ख़बर छप जाती है। बस यही प्रबंधन लेखक और पुरस्कार को बड़ा साबित कर देते हैं। जबकि किताबें पढ़ी नहीं जा रही। कवि सुने नहीं जा रहे। वजह, पाठक और श्रोता समझदार है, वह साहित्य को उत्पाद समझकर पैकेजिंग और ब्रांडिंग के जाल में नहीं फंसता। वह वही पढ़ता है जो पढ़ने योग्य है।
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